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मीत बनारसी

वादे और यादें इनमें काफ़ी समानता होती । वादे भी वक़्त के साथ भुला दिये जाते हैं और यादें भी वक़्त के साथ धूमिल पड़ जाती है या यूँ कह सकते हैं कि दोनों का हश्र मिटना ही है ।इनमें एक और समानता भी होती है कि वादों की आस पर व्यक्ति पूरा जीवन निकाल देता है इसी प्रकार कभी कभी यादें भी इंसान के जीवन जीने का सहारा बन जाती हैं ।इसीलिये कहते हैं की किसी से भी कोई वादा बहुत सोच समझ कर करना चाहिये और अच्छी यादों को सहेज कर रखना चाहिये क्यूँकि वादे जब टूटते हैं तो केवल दिल ही नहीं टूटता बल्कि वो इंसान जिससे आपने वादा किया था वो भी टूट जाता है और ऐसी परिस्थिति में अच्छी यादों के साथ जीवन का सफ़र आसान हो जाता है ।

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